Tenaliram Baitho Peeth Par | तेनालीराम बैठो पीठ पर

Tenaliram Baitho Peeth Par | तेनालीराम बैठो पीठ पर

एक दिन महाराज (maharaj) कृष्णदेव राय की अंगूठी का बहुमूल्य हीरा महल में ही कहीं खो  गया । महाराज (maharaj) बहुत परेशान हुए । उन्होंने तुरन्त महल के सेवकों और सैनिकों को हीरा खोने की बात बताई और आदेश दिया कि हीरा ढूंढने के लिए महल का कोना-कोना छान मारें ।

सैनिक-सेवक महल में हीरा तलाशने में जुट गए । वह हीरा महाराज (maharaj) को किसी पहुंचे हुए संत ने दिया था और कहा था कि जब तक यह हीरा तुम्हारे पास रहेगा, तुम शत्रुओं पर विन्धमाते रही, मगर आज हीरा खो गया तो महाराज (maharaj) के मस्तिष्क में तरह-तरह की शंकाएं उभरने लगीं ।

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दोपहर तक जब हीरा न मिला तो उन्होंने बेचैन होकर घोषणा कर दी कि जो भी उस हीरे को ढूंढकर लाएगा, उसे मुंह मांगा पुरस्कार (prize) दिया जाएगा । महल में हीरे की खोज तो चल ही रही थी । संयोग से हीरा महल के जमादार को मिल गया ।

महाराज (maharaj) की तब कहीं जाकर सांस में सांस आई । उन्होंने जमादार से कहा : ”मांगो, क्या मांगते हो, हम तुम्हें मुंह मांगा इनाम देंगे ।” जमादार सोचने लगा कि क्या मांगे । उसकी कुछ भी समझ में नहीं आया तो वह बोला : ”अन्नदाता! मुझे कल तक की मोहलत दें ।”

महाराज (maharaj) ने उसकी बात मान ली । उसी दिन मंत्री के दिमाग में एक खुराफात आई । उसने तुरन्त सेनापति को बुलाकर कहा : ”किसी भी तरह उस जमादार को फुसला-उसे कुछ धन (money) देकर कहो कि कल वह सम्राट से तेनालीराम (tenaliram) की पीठ पर बैठकर बाजार की सैर करने की इच्छा जाहिर करे ।

महाराज (maharaj) ने चूंकि मुंह मांगा इनाम देने की घोषणा की है, इसलिए इकार नहीं कर सकेंगे और इस प्रकार तेनालीराम (tenaliram) का जुलूस निकलेगा ।” ”वाह-वाह, क्या बात कही है ।” सेनापति प्रसन्न हो उठा । उसने अपने कक्ष में जाकर तुरन्त जमादार को बुलाया ।

”तुम कल महाराज (maharaj) से क्या मांगोगे ?” ”समझ में नहीं आ रहा सेनापति जी कि क्या मांगू ।” सेनापति ने तुरन्त स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थैली उसकी ओर बढ़ा दी : ”ये लो, इसमें हजार स्वर्ण मुद्राएं हैं-तुम्हें महाराज (maharaj) से वही मांगना है जो हम कहें ।” ”क…क्या ?”

सेनापति ने उसे अपनी बात बताई । सुनकर जमादार डर गया । ”अगर हमारी बात नहीं मानोगे तो एक बात याद रखना कि जान से हाथ धो  बैठोगे ।” भयभीत होकर जमादार ने हामी भर दी । दूसरे दिन महाराज (maharaj) ने उसे बुलाकर पूछा : ”बोलो, क्या मांगते हो ?” ”महाराज (maharaj)!” हाथ जोड़कर वह डरते-डरते बोला: ”मैं…मैं तेनालीराम (tenaliram) जी की पीठ पर बैठकर बाजार घूमना चाहता हूं ।”

”क्या बकते हो?” महाराज (maharaj) दहाड़े: ”तुम होश में तो हो ।” ”मैं यही चाहता हूं महाराज (maharaj) ।” ”ठीक है, तुम जाओ और कल दरबार (darbar) में हाजिर होना ।” महाराज (maharaj) क्या करते । वे वचन में बँधे हुए थे । मजबूरी थी, अत: मन मसोसकर उन्होंने तेनालीराम (tenaliram) को बुलाया । महाराज (maharaj) ने सारी उलझन उन्हें बताई-फिर पूछा : ”हम तो बड़ी उलझन में फंस गए हैं तेनालीराम (tenaliram)तुम्हीं बताओ हम क्या करें ।”

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”आप बिकुल, भी चिन्ता न करें महाराज (maharaj)!” तेनालीराम (tenaliram) ने कहा: ”आपने क्या करना है, अब तो जो करना है, मैंने करना है । आप कल दरबार (darbar) लगने दें-मैं सब ठीक कर  दूंगा ।” दूसरे दिन दरबार (darbar) लगा तो जमादार नए वस्त्र पहनकर दरबार (darbar) में उपस्थित हुआ । वह गुमसुम था ।

तेनालीराम (tenaliram) उठे और पूरे दरबार (darbar) को सम्बोधित करके बोले : ”बन्धुओ! महाराज (maharaj) की अंगूठी का हीरा टूटने के एवज में जमादार ने मेरी पीठ पर बैठकर बाजार घूमने की इच्छा व्यक्त की है । मैं महाराज (maharaj) के वचन की लाज रखने के लिए इसे अपनी पीठ पर बैठाकर बाजार घुमाने ले जाऊँगा ।”

फिर वह जमादार से मुखातिब हुए : ”आओ, बैठो मेरी पीठ पर ।” सुनते ही जमादार आगे बढ़ा और तेनालीराम (tenaliram) के गले में बाहें डालकर उनकी पीठ पर सवार होने लगा । ”ठहरो-ये क्या बेहूदगी है ।” तेनालीराम (tenaliram) ने उसे डपटते हुए कहा: ”तुमने मेरी पीठ पर बैठकर सैर करने की बात कही थी-गले में हाथ डालने की नहीं-पीठ पर बैठो-बिना कुछ पकड़े ।”

क्षण भर में ही दरबार (darbar) का माहौल बदल गया । मंत्री और सेनापति के दमकते चेहरे बुझ गए । जमादार अचकचाकर कभी महाराज (maharaj) की ओर देखता, कभी सेनापति की ओर । ”सोच क्या रहे हो-पीठ पर बैठते हो या नहीं ।” अचानक तेनालीराम (tenaliram) ने कड़ककर  पूछा ।

”बिना सहारे के पीठ पर कैसे बैठा जा सकता है ?” जमादार रुआंसा सा हो उठा । ”कैसे बैठा जा सकता है ? ये बात भी उससे पूछो जिसके कहने पर तुमने मेरी पीठ पर बैठकर सैर करने की बात कही थी ।” तेनालीराम (tenaliram) गुर्राया ।

जमादार की नजर फौरन सेनापति की कुर्सी की ओर उठी । मगर वह वहां नहीं था । जमादार फूट-फूटकर रोने लगा, फिर लपककर उसने महाराज (maharaj) के पांव पकड़ लिए:  ”मुझे क्षमा कर दें महाराज (maharaj)-मुझे जान से मारने की धमकी दी गई थी ।” कहते हुए उसने महाराज (maharaj) को पूरी बात बता दी ।

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महाराज (maharaj) सेनापति की करतूत सुनकर आग-बबूला हो उठे- ”मंत्रीजी! हम पांच दिनों के लिए सेनापति को दरबार (darbar) से मुअत्तल करते हैं । छठे दिन उन्हें दरबार (darbar) में आकर पहले तेनालीराम (tenaliram) से माफी मांगनी होगी, तभी वे अपना आसन ग्रहण कर सकते हैं ।”  कहकर महाराज (maharaj) सिंहासन से उठ खड़े हुए जिसका अर्थ था कि दरबार (darbar) की कार्यवाही समाप्त ।

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